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रविवार, 9 जून 2013

नस्ल सुधार को समङों पशुपालक


नस्ल सुधार को समङों पशुपालक पशुपालन एक कार्य है और नस्ल सुधार अलग विषय है। आमतौर पर पशुपालक केवल पशुपालन करते हैं। नस्ल सुधार का काम कैसे हो यह उनके बूते की बात नहीं होती। जब उनका पशु गर्मी में आता है और वह मनचाही नस्ल चाहने के लिए गर्भाधान कराने जाते हैं तब या तो सरकारी छुट्टी होती है या फिर चिकित्सक नहीं मिल पाता। ऐसे में गांव के घुमक्कड़ सांड़ों से पशुओं का गर्भाधान कराना उनकी मजबूरी बन जाता है। राजस्थान के सीमावर्ती जनपदों में वही नस्ल अच्छा उत्पादन दे सकती हैं जिनमें गर्मी को सहन करने की क्षमता हो। इस तथ्य को ध्यान में रखकर ही पशु खरीदना चाहिए।
गर्मियों के मौसम में तापमान 50 डिग्री सेल्सियस से अधिक हो जाने, पेयजल की कमी एवं हरे चारे की अनुपलब्धता जैसे कारणों की वजह से थारपारकर अथवा गिर नस्ल की गायों का पालन लाभकारी सिद्ध हो रहा है।
थारपारकर गायों की नस्ल राजस्थान के बाड़मेर, जैसलमेर एवं जोधपुर जिलों में मिलती हैं। इनकी कद-काठी मजबूत होने के कारण इनमें उच्च तापमान सहने, सूखे चारे से जीवनयापन करने एवं एक दुग्ध उत्पादन का¶(ब्यांत) में औसतन 1800 से 2500 लीटर दूध देने की क्षमता होती है। इनके दूध में वसा की मात्रा भी देशी गायों की तुलना में अधिक होती है। इसी प्रकार गिर नस्ल की गायें भी राजस्थान के लिए या राजस्थान के सीमावर्ती इलाकों के लिए मुफीद मानी गईं हैं। यह गाय राजस्थान के अजमेर, जोधपुर, पाली, भीलवाडा एवं गुजरात के काठियावाड़ जिलों में मिलती है। इस नस्ल की गायों की मजबूत कद-काठी होती है जो जंगल में घूमकर अपना भोजन जुटा लेती हैं। इस नस्ल की गायें एक दुग्ध उत्पादन का¶(ब्यांत) में औसतन 1800 लीटर दूध देती हैं। इन दोनों गायों की नस्लों की कुछ खासियतें होने की वजह से भरतपुर जिले में लुपिन फाउण्डेशन ने 230 गाय पशुपा¶कों को उपलब्ध कराई हैं। इसके साथ ही नस्ल सुधार के लिए 12 सांड भी पशुपालकों को मुहैया कराये हैं। इन सांड़ों के प्राकृतिक गर्भाधान विधि द्वारा जिले में गिर व थारपारकर गायों की नस्¶ों को और बढ़ावा मिलेगा।
जिन किसानों के पास पर्याप्त हरे चारे, पेयजल एवं संतुलित दाना आदि की व्यवस्था है उनके लिए भैंसपालन अधिक लाभकारी माना गया है। भैंसपालन के लिए हरियाणा की मुर्रा नस्ल की भैंस अधिक उपयोगी सिद्घ होती है। मुर्रा नस्ल की भैंसें हरियाणा के रोहतक, जींद, हिसार एवं पंजाब के पटिया¶ा जिलों में बहुतायत में मिलती हैं। इस नस्ल की भैंसों का रंग का¶ा, आंखें चमकीली, पीठ चौड़ी, उभरा हुआ सिर, सींग गोल व घुमावदार होते हैं जो एक दुग्ध उत्पादन काल (ब्यांत) में औसतन 1500 से 2500 लीटर दूध देती हैं। दूध में वसा की मात्रा 7 से 8 प्रतिशत होती है। इस वजह से अन्य दुधारू पशुओं के दूध के मुकाबले मुर्रा नस्ल की भैंसों का दूध अधिक दर पर बिकता है।
मुर्रा नस्ल की भैंसों में दुग्ध उत्पादन की क्षमता अधिक होने को देखते हुए लुपिन फाउण्डेशन ने सामान्य भैंसों के स्थान पर मुर्रा नस्ल की भैंसों को बढ़ावा देने के ¶िए 82 गांवों के 1215 पशुपा¶कों को हरियाणा से मुर्रा नस्ल की भैंसें उपलब्ध कराई हैं। इसके साथ ही हरियाणा व अन्य क्षेत्रों से 4 से 6 माह की मुर्रा नस्ल की 260 पड़िया(बच्चा) भी उपलब्ध कराए हैं जो एक-डेढ़ वर्ष में भैंस बन जाते हैं।
इसके अलावा हरियाणा से लाकर पशुपालकों को 97 भैंसा सांड भी दिलाये गए हैं ताकि ग्रामों में ये भैंसा सांड प्राकृतिक गर्भाधान से मुर्रा नस्ल की भैंसों का इजाफा कर सकें। मुर्रा नस्ल की भैंसें अधिक दुग्ध उत्पादन करने के कारण इनकी कीमत भी सामान्य भैंसों के मुकाब¶े कई गुना अधिक होती है।
औसतन मुर्रा नस्ल की भैंस 40 से 60 हजार रुपये में मिलती है जो प्रतिदिन 15 से 20 लीटर दूध आसानी से दे देती हैं।
मुर्रा नस्ल के भैंसपालन में सबसे बड़ा लाभ यह भी है कि इसकी एक से डेढ़ वर्ष की पड़िया (बच्चा) 25 से 30 हजार रुपये में आसानी से बिक जाती है। मुर्रा नस्ल का नर बच्चा(पाड़ा) भी दो-तीन वर्ष में भैंसा बन जाता है जो 50-60 हजार रुपये में आसानी से बिक जाता है।
भरतपुर जि¶े में मुर्रा नस्ल की भैंसों को बढ़ावा देने और नस्ल सुधार कार्यक्रम में इजाफा करने के ¶िए नाबार्ड ने लुपिन को अम्ब्रेला प्रोजेक्ट फॉर नेचुरल रिसोर्स मैनेजमेंट (यूपीएनआरएम) परियोजना भी स्वीकृत की है। इसमें वैज्ञानिक विधि से पशुपालन करने, पशु नस्ल सुधार कार्यक्रम संचा¶ित करने, बीमार पशुओं का इलाज करने, गोबर गैस संयंत्र स्थापित कराने, घरों में धुंआ रहित चूल्हे बनाने आदि कार्य शामिल हैं।
स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल किस्मों का चयन और विकास ही बढ़ाएगा पशुपालन का मुनाफा सफलता की कहानी

धन-धान्य से पूर्ण करेगी धान की खेती


समूचे विश्व में करीब 160 मिfयन हैक्टेयर में धान की खेती होती है। इससे करीब 685 मि¶ियन टन चावल प्राप्त होता है। एशिया में चावल का 90 प्रतिशत उत्पादन और खपत दोनों है। भारत में करीब 44 मि¶ियन हैक्टेयर में चावल की खेती होती है। इससे गुजरे सा¶ करीब 100 मि¶ियन टन चावल का उत्पादन हुआ। चीन के बाद भारत चावल उत्पादन में विश्व में दूसरे नंबर पर है और एशियाई देशों की खाद्य जरूरत को पूरा करने में चावल का अहम योगदान है। देश के कुल अनाज उत्पादन में चावल का योगदान 40 प्रतिशत है। कृषि निर्यात में इसकी हिस्सेदारी करीब 25 फीसदी है। उत्पादकता 2.1 टन प्रति हैक्टेयर है जो अन्य देशों की 2.9 टन प्रति हैक्टेयर से काफी कम है। इसे बढ़ाने की अपार संभावनाएं हैं। दिलीप कुमार यादव सूखे के हा¶ात में कैसे हो धान की खेती धान ज¶ीय पौधा नहीं है ¶ेकिन किसान इसकी खेती ज¶ीय पौधों की तरह करते हैं। मस¶न खेतों में बेतहासा पानी भरे रखते हैं। कई बार यह पानी फस¶ में रोगों का कारण बनता है। इस समय मौसम बेरुखी दिखा रहा है। इन हा¶ात में 2.8 फीसदी मीठे पानी से कैसे गुजर बसर हो। मीठे पानी की उपयोगिता समझनी होगी और उसी के अनुरूप कृषि के तौर तरीके बद¶ने होंगे।
वर्तमान हा¶ात में कम पानी में धान की खेती के ¶िए किसानों को यह चाहिए कि वह 15-20 दिन की पौध की रोपाई ही कर दें। यदि पौध बड़ी हो गई है तो उसकी पत्तियों को दो से तीन इंच काट दें। क्योंकि इन पत्तियों में पत्ती ¶पेटक कीट के अंडे होते हैं। समूचे पौधे के रोपने पर पौधे की रोपाई करते ही फस¶ रोगग्रस्त हो जाती है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि धान की फस¶ भी छह पानी में आसानी से हो सकती है। पूसा संस्थान के विशेषज्ञ डा़ सीवी सिंह बताते हैं कि यदि खेत में पानी लगाने का कोई साधन न हो और जमीन में दरारें पड़ जाएं तो निराई कराएं। इससे एक तो खरपतवार मारने के ¶िए छिड़की जाने वा¶ी दवा का खर्चा बचेगा। दूसरा जो उर्वरक खेत में डा¶ेंगे वह पौधे की जड़ों तक आसानी से पहुंचेगा और पौधों का अच्छा विकास होगा।
सूखे मौसम में धान के खेतों में यदि पानी ज्यादा भरा जाएगा तो उसमें रोग संक्रमण की संभावना ज्यादा रहेगी।।
इस बात की परवाह न करें कि जमीन सूख गई है। पौधे न सूखें इतनी नमी बनाए रखें। पह¶ी निराई पौध की रोपाई के 25 से 30 दिन के बाद करें और निराई के बाद खेत में उर्वरक डा¶कर हल्का पानी लगाएं। कम पानी में धान की फस¶ ¶ेने के ¶िए खेत में दो बार निराई करानी पड़ सकती है ¶ेकिन इसके परिणाम भी अन्य तरीकों से की गई खेती की तुलना में सार्थक होंगे।
धान की खेती ने किसानों की मा¶ी हा¶त में सुधार किया है ¶ेकिन इसके नतीजे आगामी पीढ़ी के ¶िए बड़े भयावह हो सकते हैं। अके¶े यूपी में धान का क्षेत्रफल बढ़ने से प्रदेश में 108 अति दोहित एवं क्रिटिकल क्षेत्र बढ़े हैं। एक कि¶ोग्राम धान 2500 से 3000 लीटर पानी से तैयार होता है।।
मस¶न करीब 700 ग्राम चावल पाने के ¶िए हमें इतने पानी की खपत करनी ही होती है।
श्री विधि है बेहतर विकल्प इस विधि को मेडागास्कर भी कहा जाता है। इसके ¶िए धान की पौध को आठ से 12 दिन की अवधि में खेत में रोप दिया जाता है। लाइन से लाइन और पौधे से पौधे की दूरी कम से कम 20 सेण्टीमीटर रखते हैं। इस विधि में पानी कम लगाना होता है। इस तकनीक से धान की खेती में जहां भूमि, श्रम, पूंजी और पानी कम लगता है , वहीं उत्पादन 300 प्रतिशत तक ज्यादा मिलता है।
इस पद्घति में प्रच¶ित किस्मों का ही उपयोग कर उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है।
कैरिबियन देश मेडागास्कर में 1983 में फादर हेनरी डी लाउ¶ेनी ने इस तकनीक का आविष्कार किया था। इधर उड़ीसा में इस विधि से किसान पह¶े से ही खेती करते रहे हैं। अब यूपी सहित कई राज्यों ने इस विधि को अपनाया तो है ¶ेकिन इसके प्रचार प्रसार पर कोई खास काम नहीं हुआ है। अब यह विधि 21 देशों में अपनाई जा रही है। भारत में इस विधि का उपयोग 2003 से शुरु हुआ। इसकी खूबी यह है कि इस विधि से खेती करने में पानी खेत में कम लगता है। पौधों में कल्ले ज्यादा बनते हैं। इसके कारण उत्पादन भी ज्यादा मिलता है। खास बात यह है कि धान में कम पानी लगने से उमस कम बनती है। इसके च¶ते रोग भी कम लगते हैं।
गेहूं की तरह करें धान की बुवाई 

अन्तर्राष्ट्रीय गेहूं एवं मक्का अनुसंधान संस्थान मैक्सिको के दक्षिण एशिया कॉर्डिनेटर डा0 राजगुप्ता की मानें तो सीधी बुवाई बहुत कारगर है। वह मानते हैं कि इस विधि में किसान गेहूं बोने वा¶ी मशीन उपयोग कर सकते हैं। इसके ¶िए उन्हें बीज वा¶े बॉक्स में खाद और खाद वा¶े बॉक्स में बीज डा¶ना होता है। वह कहते हैं कि खेत का प¶ेवा करके धान गेहूं की तरह बोने के बाद खेत में तत्का¶ उगने से रोकने वा¶े खरपतवारनाशी पेंडामेथा¶िन दवा का छिड़काव करना चाहिए। बुवाई से पूर्व धान को 10 घण्टे भिगो ¶ें। बाद में पानी से गेहूं की तर लगाएं। पानी खेत में केव¶ इतना दें कि जमीन में मोटी दरारें न बन जाएं। यह प्रयोग मथुरा जनपद के सैनवा गांव, अड़ींग के पूर्व प्रधान मुनीष स्वरूप एवं पंडित दीनदया¶ उपाध्याय पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्या¶य एवं गौ अनुसंधान संस्थान के माधुरीकुण्ड कृषि फॉर्म पर सार्थक सिद्घ हुआ है। फॉर्म प्रभारी एसके शर्मा ने बताया कि रोग कम लगते हैं और पानी की भी कम आवश्यकता होती है। सेनवा के किसान देव शर्मा व अड़ींग के किसान मुनीष ने बातया कि मशीन से धान की खेती करने से करीब आठ हजार रुपए प्रति हैक्टेयर की लागत बच जाती है।
. चावल में उच्च गुणवत्ता का फाइवर एवं प्रोटीन पाया जाता है।
. विश्व में ख्याति पाने वा¶े बासमती चावल का उत्पादन केव¶ पाकिस्तान और भारत में ही होता है।
. चावल की भूसी में पर्याप्त मात्रा में विटामिन बी 6, आयरन, फास्फोरस, मैगAीशियम, पोटेशियम पाया जाता है।
. चावल के प्रोटीन का प्रयोग बा¶ों की मोटाई बढ़ाने वा¶े उत्पादों एवं सौन्दर्य प्रसाधनों में किया जाता है।
. चावल में को¶ेस्ट्रॉ¶ नहीं होता और वसा की मात्रा बहुत कम होती है।

कृषि टिप्स करें खस की खेती


खस में लागत कम और मुनाफा ज्यादा होता है। इसकी खेती के लिए खराब मिट्टी भी काम कर जाती है। इसके तेल की बाजार में अच्छी कीमत मिलती है। इसके लिए ज्यादा तेल देने वाली किस्म की नर्सरी डालनी चाहिए।
नर्सरी तैयार करने के लिए सिमवृद्धि जैसी किस्म का चयन करें। सीमैप लखनऊ से इसके पौधे भी बेहद सस्ती दर पर दिए जाते हैं। खेत की ठीक से जुताई करने के बाद प्रति एकड़ की दर से पांच कुंतल जिप्सम मिला देनी चाहिए। खेत में पौधे लगाने के दो दिन बाद पौधों की सिंचाई कर देनी चाहिए। बरसात के मौसम को छोड़कर हर 15-20 दिन में सिंचाई करते रहनी चाहिए। रोपाई के समय डीएपी, यूनिया व पोटाश आवश्क रूप से जुताई के दौरान मिला दें। इसकी खेती ज्यादा पानी वाले इलाकों में भी की जा सकती है। जल भराव वाले इलाकों में इसकी खेती करने पर इसकी जड़ों से तेल की मात्रा ज्यादा मिलती है। अच्छा तेल पाने के लिए इसकी जड़ों की खुदाई तेजी से करने वाली मशीन से करानी चाहिए। खस के तेल की बाजार में अच्छी मांग है लेकिन किसानों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि इसकी प्रोसेसिंग यूनिट उनसे कितनी दूरी पर है।

प्रसव के पूर्व और बाद में कैसे करें पशु सुरक्षा


पशु के प्रसव को लेकर किसान ज्यादा चिंतित नहीं होते। उनकी चिंता पशु के बच्चा देने के बाद शुरू होती है। इसका अहम कारण यह है कि किसान को पशु चिकित्सक ग्रामीण अंचल में बेहद कम मिल पाते हैं।
यदि किसान प्रसव से पूर्व, ब्याने के समय और बाद की स्थिति में ठीक से देखभाल करें तो उनके पशु के जीवन काल के सभी गर्भकाल ठीक ठाक गुजरेंगे।
गर्भावस्था के अंतिम तीन महीनों में पशु के शरीर की आवश्यकता बढ़ जाती है। उसे अपने और पेट में पल रहे जीव के पोषण के लिए पर्याप्त दाना और हरा चारा देना चाहिए। स्वस्थ बच्चे के लिए डेढ़ से दो किलोग्राम ठोस दाना अतिरिक्त देना चाहिए। इसके अलावा पशु की पाचन क्रिया ठीक रखने के लिए विटामिन ए आवश्यक होता है। इसकी पूर्ति हरे चारे से की जा सकती है। गर्भकाल के अन्तिम तीन महीनों में पशु को कैल्शियम नहीं देना चाहिए। यह उसे गर्भकाल के प्ररंभ में खिलाना चाहिए। ब्याने से 48 घण्टे पूर्व कैल्शियम देने से दुग्ध ज्वर जैसी बीमारी होने का खतरा कम हो जाता है। ब्याने से एक दिन पहले पशु के जननांग से द्रव्य का श्राव होने लगता है। यह स्थिति उत्पन्न होने के बाद रात और दिन में हर घण्टे बाद पशु बगैर छेड़े निगरानी में रखना चाहिए। ब्याने से पूर्व जननांग से एक द्रव्य से भरा बुलबुला निकलता है जो धीरे-धीरे बड़ा होता है और अंत में फट जाता है। इसमें से ही बच्चे के पैर के खुर निकलते हैं। इसके बाद अगले पैरों के घुटनों के बीच सिर दिखाई देता है।
कभी-कभी अपने आप बच्चा निकल आता है और कई बार पशु कमजोर होने पर बच्चे को बाहर निकालने में परेशानी होती है। परेशानी वाली स्थिति में तत्काल कुशल पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए। ब्याने से तीन चार दिन पूर्व से ही पशु को अलग बाड़े में बांधना चाहिए। एक हफ्ते पहले से विटामिन डी-3 देना चाहिए।
ब्याने के बाद जेर गिरने का इंतजार करना चाहिए। जेर आठ से 12 घण्टे में गिर जाता है। इसे गिरते ही उठाकर गड्ढ़े में दबा देना चाहिए। 12 घण्टे में भी जेर न गिरे तो उसे पशु चिकित्सक से संपर्क करके निकलवाना चाहिए। ब्याने के तुरंत बाद सबसे पहले बच्चे को दूध पिलाना चाहिए।
पशु का दूध ब्याने के 15-20 मिनट बाद निकालना चाहिए। पहला दूध एकबार में नहीं निकालना चाहिए। इससे पशु के शरीर में कैल्शियम की कमी हो जाती है। बच्चा देने के बाद पशु को काफी थकान हो जाती है। इसलिए पशु को उबले हुए चावल, उबला बाजरा, तेल मिलाए हुए गेहूं, गुड़, अजवायन, मेथी, अदरक आदि देनी चाहिए। पशु को गर्म पानी नहीं देना चाहिए।
जेर देने के बाद यदि ठंड के दिन हों तो ताजा पानी से नहलाना चाहिए। ब्याने के 45 से 60 दिन बाद पशु गर्मी में आता है। उसके गर्मी में आने का ध्यान भी रखना चाहिए।
यदि ऐसा नहीं होता तो पशु चिकित्सक से संपर्क करना चहिए।
डा. गुंजन बघेल, वेटरिनरी विश्वविद्यालय मथुरा

धान की खास किस्में जो पूरे देश में प्रच¶ित है


1-पूसा बासमती छह, 1401 किस्म पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखण्ड के ¶िए अनुमोदित की गई है। सिंचित अवस्था में बुवाई के बाद इस किस्म का उत्पादन 50 से 55 कुंतल प्रति हैक्टेयर मिलता है। धान की यह मध्यम बौनी किस्म है जो पकने पर गिरती नहीं है। दानों की समानता व पकने की गुणवत्ता के हिसाब से यह किस्म पूसा बासमती 1121 से बहुत अच्छी है।
इसका दाना पकने पर एक समान रहता है। इसमें बहुत अच्छी सुगंध आती है। इसके पकने की अवधि 150 से 155 दिन ¶ेती है।
2-उन्न्त पूसा बासमती एक, 1460 किस्म पंजाब, हरियाणा, यूपी और उत्तराखण्ड के ¶िए ही संस्तुत है। सिंचित अवस्था में उपज 55 से 60 कुंतल मिलती है। इस किस्म में जीवाणु पर्ण झुलसा प्रतिरोधक क्षमता को समाहित करके एक्स ए 13 व एक्स ए 21 जीनों को परिमिडीकरण करके तथा पूसा बासमती एक के साथ गुण सुरक्षित रखते हुए विकसित की गई है। यह किस्म 135 से 140 दिन में पक कर तैयार होती है। पकाने में इसके दानों की गुणवत्ता बहुत अच्छी है।
3-पूसा सुगन्ध पांच, 2511 किस्म दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और जम्मू के ¶िए संस्तुत है। सिंचित अवस्था में रोपाई पर इसकी उपज 55 से 60 कुंतल तक होती है।
यह अर्ध बौनी उच्च उपज देने वा¶ी सुगन्धित चावल की किस्म उत्तर भारत में बहुफस¶ीय पद्घति के ¶िए उपयुक्त है। इस किस्म का दाना अच्छी सुगन्ध वा¶ा एवं अधिक लम्बा होता है। यह किस्म झड़ने के प्रति सहिष्णु है। यह गा¶ मिज, भूरे धब्बे रोग के ¶िए प्रतिरोधी भी है। पत्ती ¶पेटक एवं ब्लास्ट के ¶िए मध्यम प्रतिरोधी है। यह 120 से 25 दिन में पक जाती है।
4-पूसा बासमती या सुगंध चार, 1121 बासमती धान उगाने वा¶े सभी क्षेत्रों के ¶िए उपयुक्त किस्म है। उपज 40 से 45 कुंतल प्रति हैक्टेयर आती है। यह तरावड़ी बासमती से एक पखवाड़ा अगेती है। इसका दाना लम्बा होता है। पकने के बाद करीब 20 मिली मीटर लम्बा हो जाता है। इसका विदेशों को सर्वाधिक निर्यात होता है।
5-पूसा सुगंध तीन, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश के ¶िए है। उपज 60 कुंतल तक मिलती है। अर्धबौनी इस किस्म में बासमती के सभी गुण हैं। दाना खाने में मुलायम, सुगंधित व स्वाद में अच्छा होता है। यह किस्म पकने में मध्यम अगेती है।
125 दिन में पक जाती है।
6-पूसा सुगंध दो, भी उपरोक्त सभी राज्यों में बोई जाती है। सिंचित अवस्था में उपज 55 कुंतल तक आती है। यह धान की अर्ध बौनी अधिक उपज देने वा¶ी किस्म है। मध्यम अगेती यह किस्म 120 से 125 दिन में पकती है।
7-पूसा बासमती एक, उपरोक्त सभी राज्यों के ¶िए है। उपज 50 से 55 कुंतल प्रति हैक्टेयर तक आती है। यह बासमती धान की मध्यम बौनी किस्म है। बासमती चावल के राष्ट्रीय निर्यात में इस किस्म की 50 प्रतिशत हिस्सेदारी है। यह 130 से 135 दिन में पकती है।
8-पूसा 44, किस्म कर्नाटक, केरल, पंजाब, हरियाणा एवं उत्तर प्रदेश में बोई जाती है। यह बगैर सुगंध वा¶ी किस्म है। सिंचित अवस्था में इसकी उपज 70 से 80 कुंतल तक आती है। बौनी प्रजाति की इस किस्म को पकने में 140 से 145 दिन का समय लगता है। मिलीकरण के ¶िए इसका दाना बहुत अच्छा है। यह मशीनों से कटाई एवं निकासी के दौरान बेहद कम टूटता है।
9-पीआरएच 10, संकर धान है।
पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड में बोई जाती है। उपज 65 कुंतल तक होती है।
यह बासमती गुणों वा¶ी विश्व की पह¶ी संकर किस्म है। पकने में 110 से 115 दिन ¶ेती है। यह कम पानी में तैयार हो जाती है।
10-सरयू 52 मोटा चावल होता है।
150 दिन में पकने वा¶ी इस किस्म से 60 से 70 मन प्रति एकड़ की उपज मिलती है। नरेन्द्र देव कृषि विश्वविद्या¶य फैजाबाद की यह किस्म काफी ¶ोकप्रिय है।
नरेन्द्र 359 किस्म भी मोटे में है। 140 दिन में पकती है। 90 मन प्रति एकड़ तक उपज मिलती है।
11-एचकेआर 47, 126, 127 एचएयू की अच्छी किस्में हैं।
सुगंध रहित मोटे चावल वा¶ी इन किस्मों को भी किसान लगाते आ रहे हैं।
12-केन्द्रीय मृदा लवणता संस्थान करना¶, सीएसआर 32 व 36 किस्म खारी पानी वा¶े इलाकों और सै¶ाइन इलाकों के ¶िए उपयुक्त हैं। उपज 60 मन प्रति एकड़ की मिलती है। यह किस्म 130 से 135 दिन में पकती हैं।
धान की खेती का समय आ गया है। इसकी खेती के लिए अभी नर्सरी डालने की तैयारी होने लगी है लेकिन इससे पहले किसानों को यह जानना जरूरी है कि उनके यहां पानी की उपलब्धता कैसी है और उसके लिए कौन सी किस्में कारगर होंगी।

मधुमक्खी मारे डंक तो क्या करें


मधुमक्खी पालन अच्छा कारोबार है लेकिन इसमें कई सावधानियां भी जरूरी हैं। इस समय ज्यादातर इलाकों में किसी फसल पर फूल न होने के कारण बी कीपर उन्हें चीनी खिलाकर जिंदा रखे हुए हैं। गर्मी से परेशान और खाने की तलाश में जुटी मक्खी बेहद हमला करती है। ऐसे में यदि मक्खी काटे तो सबसे पहले उसका डंक निकालना चाहिए। यदि मक्खी के काटते ही नाखूनों की मदद से डंक निकल गया तो डंक में छिपी जहर की थैली नहीं फट पाएगी और इससे उत्पन्न होने वाले दर्द से बचा जा सकेगा। डंक वाले स्थान पर चूना, साबुन एवं स्प्रिट, वैसलीन आदि लगानी चाहिए। मुंह और नाक के पास मक्खी के काटने पर सांस लेने में तकलीफ हो सकती है। ऐसे में आमतौर पर चिकित्सक मिथाइल प्रिडिंसोलोन सोडियम सक्सीनेट जैसी कुछ दवाएं देते हैं। ऐसे में तत्काल चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।